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Saturday, August 6, 2011

Abhay Kumar 6:53pm Aug 6

जो मुलनिवासी मारे नहीं गये, वे अब मारे जायेंगे..!!!!!!!
क्या वोट रुपी शस्त्र से हम शासनकर्ती जमात बन सकते???

आज देश की स्वतन्त्रता सम्प्रभुता गिरवी पर रख दी गयी। वित्तमंत्री, प्रधानमंत्री, राजनेता वाशिंगटन से तैनात किये जाने लगे। प्रणव जैसा कुलीन ब्राह्मण वास्तविक प्रधानमंत्री बतौर अमेरिका की दलाली कर रहे हैं ठीक वैसे ही, जैसे इंदिरा जमाने में नंबर दो की हैसियत से रुसी दलाली कर रहे थे। वामपंथी तब भी कांग्रेस के साथ थे नेहरु प्रगतिशील थे तो इंदिरा गांधी समाजवादी। अब सोनिया गांधी, मनमोहन सिहं धर्म निरपेक्ष। देश प्रदेश की नीतियां सरकारें बदलते ही बदल जातीं ततत्काल, पर नरसिम्हा सरकार के जमाने से जारी नवउदारवाद का तूफान देखिये, थमने का नाम नहीं लेता। भाजपाइयों का हिंदुत्व हो या फिर वामपंथियों का मार्क्सवाद, भारत को अमेरिका बना देने की आपाधापी जारी। अमेरिकी उपनिवेश में तब्दील हो गया यह विभाजित, रक्ताक्त उपमहादेश। मारे जा रहे हैं यहां के मुलनिवासी। सेज के बहाने, कैमिकल हब की खातिर, विदेशी पूंजी के लिए अमेरिकी रियासते बन रही हैं। प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट मची है। मूलनिवासी आजीविका और जीवन से वंचित हो रहे है। बनाने को बना दिये तीन नये राज्य, उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़। राष्ट्रियता किनारे हो गयी और हिंदुत्व का परचम लहराया। पूर्वोत्तर और कश्मीर में विशष सैन्य कानून लागू है पांच दशक से। हमने आपात काल देख लिया। नक्सलवाद का दमन देख लिया। दलितोत्थान देख लिया। हरित क्रंति और समाजवाद के बाद आपरेशन ब्लू स्टार और बाबरी ध्वंस भी देख लिए। सांप्रदायिक आंदोलन, पूर्वोत्तर और कश्मीर में आतंकवाद, खालिस्तान आंदोलन और संपूर्ण क्रांति, कांग्रेसवाद का जायजा भी लिया हमने। अब अपनी कृषि, शिक्षा, भाषाओं, संस्कृतियों, लोकधुनों, गीतों, साहित्य, स्वास्थ्य, देशी तमाम कामधंधों को तबाह होते देख रहे हैं। अमेरिकी दिवालिया अर्थयवस्था का पिछलग्गू हो गया देश। नतीजा देखिये, कैसे गोता मारता शेयर सूचकांक। फिर भी विकास दर के फर्जी आंकड़े जारी करके फरेब में फंसाया जाता हमें। आररक्षण और वेतनमान के जरिये खुशामदी तबका राजकाज में मददगार। किसान या भूखों मर रहे हैं या आत्महत्या कर रहे हैं। किस देश के निवासी हैं हम? जिस देश में गंगा बहती है और तमाम नदियां बिक गयीं। रहने को घर नहीं, सारा जहां हमारा। मूलनिवासियों को जड़ों से उखाड़कर वे वंदेमातरम गाते हुए गला काट रहे हैं। कातिल नीली संस्कृति ने पांव पसार लिये हैं। एकजुट हैं ब्राह्मण, यहूदी और श्वेत रंगभेदी कारपोरेट का साम्राज्यवाद। छह हजार जातियों में बंटा यह देश हमलावरों से बचा नहीं सकता हमें और हम कायल हैं मनमोहन, चिदम्वरम, आडवाणी, बुद्धदेव, ममता, नरेंद्र मोदी, वसुंधरा, नवीन, देशमुख, सचिन, सानिया, सोनिया, राहुल , प्रियंका, अमिताभ, ऐश, गांगुली, अंबानी, टाटा जैसे उत्तर आधुनिक आइकनों के। हमें कौन बचायेगा?... बचायेगा हमें.. वोट का शस्त्र... जिसका उपयोग यहां के मुलनिवासी कर सकेंगे अपनी बचीखुची साख को बचाने ले लिए... केवल उत्तरप्रदेश से ही काम नहीं चलेगा... सारा देश पादाक्रांत करना होगा हमें.. नहीं तो देख लो मुलनिवासियों क्या हाल हो सकता है तुम्हारा....

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